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Sunday 16 August 2009

कहाँ लेकर जायेगी निगोडी महंगाई..!

एक समय ऐसा भी था जब इन्सान और जानवर में कोई फर्क नहीं था, ...हम भी नंगे, वे भी नंगे ! बदलते समय के साथ इंसान सभ्य होता गया ,सभ्यता हमारी पहचान बन गई, हम शर्म-हया को समझने लगे, हमने इज्जत के प्रतिक - कपड़ों को अपनाया, हमारे खान-पान के तरीके भी बदले, जंगली कंद-फल की जगह हम अन्न खाने लगे , हमारी थाली में रोटी- सब्जी आ गई, हम पूरी तरह से बदल गए, हमने हमारे आगे (आदि-मानव ) लगे शब्द में से आदि शब्द को निकाल फेंका, हम मानव बन गए, अब मुझे डर है कि- महंगाई कि मार हमें फिर से आदि -मा!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पेश है दर्द को बयां करता ये कार्टून-


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4 comments:

  1. जांधिए की भी ज़रूरत क्या है

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  2. काजल भाई, शायद आप ठीक ही कह रहे हैं, सबकुछ उतार लिया है इस महंगाई ने, अब जांघिया भी उतार ले तो क्या गम है :) :) :)

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  3. पेड़ों पर पत्‍ते अभी बहुत हैं

    किस काम आयेंगे

    वही तो सब कुछ छिपायेंगे

    महंगाई से तब भी न बच पायेंगे

    पर हवा जो चल गई तो ....

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